प्राचार्य का संदेश –

वन्दे मातरम्
शिक्षा एक साधना है जो न केवल हमारी आजीविका का साधन है, साथ ही जीवन के प्रति दृष्टिकोण को निर्मित करने में मदद करती है।
जीवन ईश्वर द्वारा दिया गया एक उपहार है, और उपहार हमें हमेशा प्रसन्नता से स्वीकार करना चाहिए।
अंग्रेजों की शिक्षा नीति ने भारतीय शिक्षा पद्धति को बहुत हानि पहुॅचायी है। हम जहॉ से चले थे आज हमें वहीं पहुॅचने की आवश्यकता महसूस होती है। प्राचीन समय में प्रत्येक ग्राम में प्रत्येक कौशल वाले व्यक्ति हुआ करते थे, जिसे आज स्किल डवलपमेंट के नाम से पुनः सृजित किया जा रहा है।
रोजगार के क्षेत्र में बहुत सारे आयाम आज विद्यमान हैं। अतः आवश्यकता है कि हम अपना सोच का दायरा बढ़ाकर नई दिशाओं में बढ़ सकें। इसके लिये विभिन्न पाठ्यक्रम इसमें उपयोगी हो सकते हैं। संदीप माहेश्वरी ने कहा है कि जीवन एक ऐसा क्रिकेट खेल है जिसमें पीछे विकेट नही है और प्रत्येक बाल आपको अवसर प्रदान करती है। आप कभी आउट नहीं हो सकते जब तक आप पिच पर डटे हैं।
रटने की पद्धति से आपको आंशिक सफलता तो मिल सकती है लेकिन बुनियादी आधार तैयार नहीं हो पाता है। अतः प्रयास यह करना चाहिए कि प्रत्येक विषयवस्तु को समझा जाये। इससे आप संबंधित विषयवस्तु को जीवन भर नहीं भूल पायेंगे।
स्वस्थ शरीर से ही आप सभी प्रकार की सफलता को प्राप्त कर सकते हैं। स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिष्क का वास होता है। स्वस्थ शरीर और स्वस्थ मस्तिष्क की जुगलबंदी से आपको शिखर पर पहुॅचने से कोई नहीं रोक सकता है।
भारतीय परंपरा में संस्कार पक्ष को बहुत महत्व दिया गया है। माता-पिता, बड़े लोगों एवं गुरूजनों का सम्मान करने में हम स्वयं सम्मानित होते हैं। यह प्रयास बने रहना चाहिए।
तकनीकी शिक्षा के युग में कंप्यूटर, अंग्रेजी एवं अन्य कौशलों को विकसित करते रहने का प्रयास सदैव करते रहना चाहिए।
एक कहावत के अनूसार अच्छी योजना से आपका आधा कार्य प्रारंभ में ही पूर्ण हो जाता है। हमें अपने शिक्षण कार्य की अच्छे से योजना बनाकर कार्य में लगना चाहिए।

शुभकामनाएं  —

जयप्रकाश तिवारी

प्राचार्य

सरस्वती शिशु मंदिर, लटेरी